Monday, 18 December 2017

गोत्र -प्रवर ऋषि

क्रमांक

गोत्र

प्रवर ऋषि

१.
अंगिरा/ आंगिरस
आंगिरस,ब्रार्हस्पत्य,वसिष्ठ
२.
अत्रि
आत्रेय,आर्चनान,श्यावाश्व
३.
काश्यप
काश्यप,अवत्सार,असित
४.
कौशिक/विश्वामित्र
विश्वामित्र,देवरात,औदल
५.
पुलस्त्य
पुलस्त्य,विश्वश्रवक,दम्भोलि
६.
जमदग्नि/ जामदग्न्य
जामदग्न्य,और्व, वसिष्ठ
७.
वसिष्ठ
वसिष्ठ,इन्द्रपमद,भरद-वसु
८.
भरद्वाज
भरद्वाज,बार्हस्पत्य,आंगिरस
९.
अगस्त्य
अगस्त्य,माहेन्द्र,मायोभुव
१०
कण्व
आंगिरस,अडमीढ,काण्व
११
कौण्डिण्य
कौण्डिण्य,वसिष्ठ,मित्रावरुण
१२
गौतम
गौतम,वसिष्ठ,बार्हस्पत्य
१३
वत्स/वच्छ
जामदग्न्य,अप्तुवान,च्यवन,भार्गव,और्व
१४
मुद्गल
मौद्गल,आंगिरस,तार्क्ष्य
१५
वासुकि
वासुकि,अनन्त,अक्षोम्य
१६
शाण्डिल्य
शाण्डिल्य,कश्यप,अवत्सार
१७
शुनक
शुनक,सोनहोत्र,गार्त्समद
१८
शोनक
शुनक,धर्मवृद्ध,गृत्समद
१९
गर्ग
गार्ग्य,आंगिरस,सैन्य
२०
हरित/हारित
आंगिरस,अम्बरीष,युवनाश्व
२१
विष्णुवृद्ध
आंगिरस,पोरुकुत्स,त्रासदस्य
२२
कुत्स
आंगिरस,मान्धात,कौत्स
२३
पराशर
परासर,शक्ति,वसिष्ठ
२४
पूतिमास
अंगिरा,उशिज,सूव चोतथ्य
२५
माण्डव्य
भृगु,तण्डि,मत्स्यगंध
२६
कपिल
विरुप,वृषार्वा
२७
याज्ञवल्क्य
आर्टाबन,पार्ष्णिन,वीरणिन
२८
व्यास
पेल,वाष्कल,सन्यश्रवस
२९
लोमश
कालशिख,गोरवृषा,कैलाप
३०
मंकिन
मंकिन,मंकणक,मंकण
३१
दुर्वासा
दुर्वासा,आत्रेय,दत्तात्रेय
३२
नारद
नारद,काण्व,पर्वत,नारदिन
३३
प्रह्लाद
विरोचन
३४
बकदालभ्य
ग्लाबमैत्र,दालभ्य

महाकविश्रीकालिदासजयंतीदिवसे स्मरणाष्टकम्


(१)अस्ति-:
अस्तीह संसारतलेधुनापि
त्वत्कीर्त्तिराशिः कविकालिदास।
कुमारकाव्यं निखिलाभिवन्द्यं
नित्यं यशो गायति तेतिनम्रम्।।
(२)कश्चित्-:
कश्चित् कविर्नास्ति समस्त्वदीयः
यो मेघदूतेन समं प्रयातुम्।
शृङ्गारवक्तः कमनीयभाष!
त्वत्पादपद्मे सततं नमामि।।
(३)वाग्-:
वागर्थपूर्णं रघुवंशकाव्यं
न कस्य चित्तं हरतीह लोके।
रामायणं नार्हति तेन साकं
हे काव्यकर्तः! शिरसा नमामि।।
(४)विशेष-:
विशेषशोभां प्रकृतेर्विलोक्य
शृंगारभावो नितरां बभौ किम्।
ऋतुप्रभाभिः स्मरसि प्रियां त्वं
हे कामचारिन्! चरणं नमामि।।
(५)शाकुन्तलम्-:
शाकुन्तले नाटकसर्वसारे
चतुर्थकाङ्के मुनिना यदुक्तम्।
तदाद्यपद्यं जगतोतिहृद्यं
कन्यापितुः स्नेहततिः कथं ते?।।
(६)मालविकाग्निमित्रम्-:
मित्रेण सा मालविका सुकाम्या
तनोति स्वर्गीयरतिं न वाच्याम्।
तत्प्रेमरीतिर्न हि भाति कुत्र
सरस्वती सा किमु ते हि माता?।।
(७)विक्रमोर्वशीयम्-:
तद्विक्रमस्यातिबलेन मुग्धा
प्रीतोर्वशी नाकपुरं विहाय।
आयाति पृथ्वीं नृपनायिकार्थं
तन्नाटकं गायति तेतिकीर्तिम्।।
(८)उपमा-:
तवोपमा काव्यरसानुशीला
शृंगारहारा कविताविलासा।
नाद्यापि तुल्यः कविपुंगवोस्ति
त्वज्जन्म धन्यं भुवि भारतं च।।
   (इति तवानुचरानुचरःपं.व्रजकिशोरः)

संस्कृत के प्राचीन और नए शब्दकोश

निघण्टु -- यास्क -- वैदिक शब्दकोश

निरुक्त -- यास्क -- निघण्टु पर शब्दार्थ कोश
अमरकोश ('नामलिंगानुशासन' या 'त्रिकांड') -- अमरसिंह
विश्वप्रकाश
मेदिनी
नानार्थार्णवसंक्षेप
वर्णदेशना
षडर्थनिर्णयकोश -- 'राक्षस' कवि
षड्मुखकोश
लघुशब्देंदुशेखर
बृहतच्छब्देंदुशेखर
बालमनोरमा
प्रौढ़मनोरमा
बृहत अमरकोश -- राजमुकुट कृत अमरकोश टीका
बृहानंद अमरकोश -- सर्वदानन्द
बृहत् हारावली -- भानुदीक्षित
हारवली
शब्दार्णवसंक्षेप
कल्पद्रुकोश
निघण्टु -- यास्क
निरुक्त -- यास्क
धातुपाठ -- पाणिनी
गणपाठ -- पाणिनी
अमरकोश -- अमरसिंह
धन्वन्तरिनिघण्टु -- धन्वन्तरि
अनेकार्थसमुच्चय -- शाश्वत -- इसी को 'शाश्वतकोश' भी कहते हैं
अभिधानरत्नमाला -- भट्ठ हलायुध (समय लगभग १० वीं० शताब्धी ई०)
वैजयंती कोश -- यादवप्रकाश (समय १०५५ से १३३७ के मध्य)
पाइयलच्छी नाममाला --
देशीनाममाला -- हेमचंद्र -- (प्राकृत—अपभ्रंश—कोश)
अभिधानचिंतामणि या 'अभिधानचिंतामणिनाममाला' -- हेमचंद्र -- प्रसिद्ध पर्यायवाची कोश
लिंगानुशासन -- हेमचंद्र
यशोविजय -- हेमचंद्र -- 'अभिधानचिंतामणि' पर उनकी स्वविरचित टीका
व्युत्पत्तिरत्नाकर (देवसागकरणि) --हेमचंद्र -- टीकाग्रन्थ
सारोद्धार' (वल्लभगणि) -- प्रसिद्ध टीका
अनेकार्थसंग्रह -- हेमचंद्र
विश्वप्रकाश - महेश्वर (११११ ई०) -- इसे 'विश्वकोश' भी अधिकतः कहा जाता है।
शब्दभेदप्रकाश -- महेश्वर -- वस्तुतः विश्वप्रकाश का परिशिष्ट है।
अनेकार्थ -- मंख पंडित (१२ वीं शती ई०)
नानार्थसंग्रह -- अजयपाल (लगभग १२ वीं—१३ वी शती के बीच)
नाममाला -- धनंजय (ई० १२ वी० शताब्दी उत्तरार्ध के आसपास अनुमानित)
हारावली -- पुरुषोत्तमदेव (समय ११५९ ई० के पूर्व)
त्रिकांडकोश -- पुरुषोत्तमदेव -- यह अमरसिंह के त्रिकाण्डकोश से अलग है।
वर्णदेशन -- पुरुषोत्तमदेव
एकाक्षरकोश -- पुरुषोत्तमदेव
द्विरूपकोश -- पुरुषोत्तमदेव
वर्णदेशना -- पुरुषोत्तमदेव
त्रिकांडकोष -- पुरुषोत्तमदेव
हारावली -- पुरुषोत्तमदेव
द्विरूपकोश -- श्रीहर्ष (उपरोक्त ग्रन्थ से अलग ग्रन्थ)
नानार्थार्णव -- केशवस्वामी (समय १२ वीं या १३ वीं शताब्दी)
नानार्थशब्दकोश -- मेदिनि -- (लगभग १४ वी शताब्दी के आसापास) ; यह 'मेदिनिकोष' नाम से अधिक विख्यात है।
अपवर्गनाममाला -- जिनभद्र सुरि -- इसको 'पंचवर्गपरिहारनाममाला भी कहते है।
शब्दरत्नप्रदीप -- कल्याणमल्ल (समय लगभग १२९५ ई०)
शब्दरत्नाकर -- महीप (लगभग १३७४ ई०)
भूरिकप्रयोग -- पद्यगदत्त
शब्दमाला -- रामेश्वर शर्मा
नानार्थरत्नमाला -- भास्कर अथवा दंडाधिनाथ (१४ वी शताब्दी के विजयनगर के राजा हरिहरगिरि की राजसभा में थे)
अभिधानतंत्र -- जटाधर
अनेकार्थ या नानार्थकमंजरी -- नामांगदसिंह का लघु नानार्थकारी है।
रूपमंजरीनाममाला -- रूपचंद्र (१६वीं शती)
शारदीय नाममाला -- हर्षकीर्ति
शब्दरत्नाकर -- वर्मानभट्ट वाण
नामसंग्रहमाला -- अप्पय दीक्षित
नामकोश -- सहजकीर्ति (१६२७)
पंचचत्व प्रकाश -- सहजकीर्ति (१६४४)
कल्पद्रुमकोश -- केशव -- 'केशवस्वामी' से ये भिन्न हैं।
नानार्थर्णव -- केशवस्वामी
शब्दरत्नावली -- मथुरेश (समय १७वी शताब्दी)
कोशकल्पतरु -- विश्वनाथ
नानार्थपदपीठिका -- सुजन
शब्दलिंगार्थचंद्रिका -- सुजन
पर्यायपदमंजरी --
शब्दार्थमंजूषा --
पर्यायरत्नमाला -- महेश्वर (संभवतः पर्यायवाची कोश 'विश्वप्रकाश' के निर्माता महेश्वर से भिन्न हैं।
पर्यांयशब्दरत्नाकर -- धनंजय भट्टाचार्य
विश्विमेदिनी -- सारस्वत भिन्न
विश्वनिघंटु -- विश्वकवि
लोकप्रकाश -- क्षेमेंद्र
अनेकार्थमाला -- महीप
पर्यामुक्तावली -- हरिचरणसेन
पंचनत्वप्रकाश -- वेणीप्रसाद
राघव खांड़ेकर -- केशावतंस
अनेकार्थध्वनिमंजरी -- महाक्षपणक
आख्यातचीन्द्रिक -- भट्टमल्ल (क्रियाकोश)
लिंगानुशासन -- हर्ष
शब्दभेदप्रकाश -- अनिरुद्ध
शिवकोश (वैद्यक) -- शिवदत्त वैद्य
गणितार्थ नाममाला --
नक्षत्रकोश --
लैकिकन्यायसाहस्री -- भुवनेश (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
लौकिक न्यायसंग्रह -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
लौकिक न्याय मुक्तावली -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
लौकिकन्यायकोश -- (लौकिक न्याय की सूक्तियाँ)
शब्दकल्पद्रुम -- राधाकान्त देव (१८८६-९४)
वाचस्पत्यम् --

Saturday, 9 December 2017

Bhagavadgita, Chapter 6 Verse 5:

Referring to the Bhagavadgita, Chapter 6 Verse 5:


उद्धरॆत् आत्मना आत्मानं न आत्मानम् अवसादयॆत् ।
आत्म एव हि आत्मनः बंधुः आत्म एव रिपुः आत्मनः ॥ ६.५ ॥



Translated broadly as: "Let a man raise himself by himself, let him not lower himself; for he alone is the friend of himself, he alone is the enemy of himself." (Swami Sivananda)



Tuesday, 21 November 2017

shri nivas gadhyam


*भारतीयदर्शनेषु मोक्षविचारः*

*भारतीयदर्शनेषु मोक्षविचारः*

1. मृत्युः मोक्षः इति *चार्वाकाः*। 
2. आत्मोच्छेदः मोक्ष इति शून्यवादिनः *माध्यमिकबौद्धाः*। 
3. निर्मलज्ञानोदयः मोक्षः इति *इतरे बौद्धाः*। 
4. कर्मकृतस्य देहस्वरूपस्य आवरणस्य अभावे जीवस्य सततोर्ध्वगमनं मोक्षः इति *जैनाः*। 
5. सर्वज्ञत्वादीनां परमात्मगुणानां प्राप्तिः याथात्म्येन भगवत्स्वरूपानुभवश्च मोक्षः इति *रामानुजीयाः*। 
6. जगत्कर्तृत्व-लक्ष्मीपतीत्व-श्रीवत्सप्राप्तिरहितं दुःखामिश्रितं पूर्णं सुखं मोक्षः इति *माध्वाः*। 
7. परमैश्वर्यप्राप्तिः मोक्षः इति *नकुलीशपाशुपताः*। 
8. शिवत्वप्राप्तिः मोक्षः इति *शैवाः*। 
9. पूर्णात्मतालाभः मोक्ष इति *प्रत्यभिज्ञावादिनः*। 
10. पारदरसेन देहस्थैर्ये जीवन्मुक्तिः एव मोक्षः इति *रसेश्वरवादिनः*। 
11. अशेषविशेषगुणोच्छेदः मोक्षः इति *वैशेषिकाः*। 
12. आत्यन्तिकी दुःखनिवृत्तिः मोक्षः इति *नैयायिकाः*। 
13. दुःखनिवृत्तिः सुखावाप्तिश्चापि इति मोक्षः इति *नैयायिकैकदेशिनः*। 
14. स्वर्गादिप्राप्तिः मोक्षः इति *मीमांसकाः*। 
15. मूलचक्रस्थायाः परानामिकायाः ब्रह्मरूपायाः वाचः दर्शनं मोक्षः इति *पाणिनीयाः*। 
16. प्रकृत्युपरमे पुरुषस्य स्वरूपेण अवस्थानं मोक्षः इति *सांख्याः*। 
17. कृतकर्तव्यतया पुरुषार्थशून्यानां सत्त्वरजस्तमसां मूलप्रकृतौ अत्यन्तलयः प्रकृतेः मोक्षः, चितिशक्तेः निरुपाधिकस्वरूपेण अवस्थानं मोक्षः इति *पातञ्जलाः*। 
18. मूलाज्ञाननिवृत्तौ स्वस्वरूपाधिगमः मोक्षः इति *अद्वैतवेदान्तिनः*।

*श्रीनिवास गद्यम्*

*श्रीनिवास गद्यम्*

श्रीमदखिलमहीमण्डलमण्डनधरणीधर मण्डलाखण्डलस्य, निखिलसुरासुरवन्दित वराहक्षेत्र विभूषणस्य, शेषाचल गरुडाचल सिंहाचल वृषभाचल नारायणाचलाञ्जनाचलादि शिखरिमालाकुलस्य, नाथमुख बोधनिधिवीथिगुणसाभरण सत्त्वनिधि तत्त्वनिधि भक्तिगुणपूर्ण श्रीशैलपूर्ण गुणवशंवद परमपुरुषकृपापूर विभ्रमदतुङ्गशृङ्ग गलद्गगनगङ्गासमालिङ्गितस्य, सीमातिग गुण रामानुजमुनि नामाङ्कित बहु भूमाश्रय सुरधामालय वनरामायत वनसीमापरिवृत विशङ्कटतट निरन्तर विजृम्भित भक्तिरस निर्घरानन्तार्याहार्य प्रस्रवणधारापूर विभ्रमद सलिलभरभरित महातटाक मण्डितस्य, कलिकर्दम मलमर्दन कलितोद्यम विलसद्यम नियमादिम मुनिगणनिषेव्यमाण प्रत्यक्षीभवन्निजसलिल समज्जन नमज्जन निखिलपापनाशना पापनाशन तीर्थाध्यासितस्य, मुरारिसेवक जरादिपीडित निरार्तिजीवन निराश भूसुर वरातिसुन्दर सुराङ्गनारति कराङ्गसौष्ठव कुमारताकृति कुमारतारक समापनोदय दनूनपातक महापदामय विहापनोदित सकलभुवन विदित कुमारधाराभिधान तीर्थाधिष्ठितस्य, धरणितल गतसकल हतकलिल शुभसलिल गतबहुल विविधमल हतिचतुर रुचिरतर विलोकनमात्र विदलित विविध महापातक स्वामिपुष्करिणी समेतस्य, बहुसङ्कट नरकावट पतदुत्कट कलिकङ्कट कलुषोद्भट जनपातक विनिपातक रुचिनाटक करहाटक कलशाहृत कमलारत शुभमञ्जन जलसज्जन भरभरित निजदुरित हतिनिरत जनसतत निरस्तनिरर्गल पेपीयमान सलिल सम्भृत विशङ्कट कटाहतीर्थ विभूषितस्य, एवमादिम भूरिमञ्जिम सर्वपातक गर्वहापक सिन्धुडम्बर हारिशम्बर विविधविपुल पुण्यतीर्थनिवह निवासस्य, श्रीमतो वेङ्कटाचलस्य शिखरशेखरमहाकल्पशाखी, खर्वीभवदति गर्वीकृत गुरुमेर्वीशगिरि मुखोर्वीधर कुलदर्वीकर दयितोर्वीधर शिखरोर्वी सतत सदूर्वीकृति चरणघन गर्वचर्वणनिपुण तनुकिरणमसृणित गिरिशिखर शेखरतरुनिकर तिमिरः, वाणीपतिशर्वाणी दयितेन्द्राणिश्वर मुख नाणीयोरसवेणी निभशुभवाणी नुतमहिमाणी य स्तन कोणी भवदखिल भुवनभवनोदरः, वैमानिकगुरु भूमाधिक गुण रामानुज कृतधामाकर करधामारि दरललामाच्छकनक दामायित निजरामालय नवकिसलयमय तोरणमालायित वनमालाधरः, कालाम्बुद मालानिभ नीलालक जालावृत बालाब्ज सलीलामल फालाङ्कसमूलामृत धाराद्वयावधीरण धीरललिततर विशदतर घन घनसार मयोर्ध्वपुण्ड्र रेखाद्वयरुचिरः, सुविकस्वर दलभास्वर कमलोदर गतमेदुर नवकेसर ततिभासुर परिपिञ्जर कनकाम्बर कलितादर ललितोदर तदालम्ब जम्भरिपु मणिस्तम्भ गम्भीरिमदम्भस्तम्भ समुज्जृम्भमाण पीवरोरुयुगल तदालम्ब पृथुल कदली मुकुल मदहरणजङ्घाल जङ्घायुगलः, नव्यदल भव्यमल पीतमल शोणिमलसन्मृदुल सत्किसलयाश्रुजलकारि बल शोणतल पदकमल निजाश्रय बलबन्दीकृत शरदिन्दुमण्डली विभ्रमदादभ्र शुभ्र पुनर्भवाधिष्ठिताङ्गुलीगाढ निपीडित पद्मावनः, जानुतलावधि लम्ब विडम्बित वारण शुण्डादण्ड विजृम्भित नीलमणिमय कल्पकशाखा विभ्रमदायि मृणाललतायित समुज्ज्वलतर कनकवलय वेल्लितैकतर बाहुदण्डयुगलः, युगपदुदित कोटि खरकर हिमकर मण्डल जाज्वल्यमान सुदर्शन पाञ्चजन्य समुत्तुङ्गित शृङ्गापर बाहुयुगलः, अभिनवशाण समुत्तेजित महामहा नीलखण्ड मदखण्डन निपुण नवीन परितप्त कार्तस्वर कवचित महनीय पृथुल सालग्राम परम्परा गुम्भित नाभिमण्डल पर्यन्त लम्बमान प्रालम्बदीप्ति समालम्बित विशाल वक्षःस्थलः, गङ्गाझर तुङ्गाकृति भङ्गावलि भङ्गावह सौधावलि बाधावह धारानिभ हारावलि दूराहत गेहान्तर मोहावह महिम मसृणित महातिमिरः, पिङ्गाकृति भृङ्गार निभाङ्गार दलाङ्गामल निष्कासित दुष्कार्यघ निष्कावलि दीपप्रभ नीपच्छवि तापप्रद कनकमालिका पिशङ्गित सर्वाङ्गः, नवदलित दलवलित मृदुललित कमलतति मदविहति चतुरतर पृथुलतर सरसतर कनकसरमय रुचिरकण्ठिका कमनीयकण्ठः, वाताशनाधिपति शयन कमन परिचरण रतिसमेताखिल फणधरतति मतिकरवर कनकमय नागाभरण परिवीताखिलाङ्गा वगमित शयन भूताहिराज जातातिशयः, रविकोटी परिपाटी धरकोटी रवराटी कितवीटी रसधाटी धरमणिगणकिरण विसरण सततविधुत तिमिरमोह गार्भगेहः, अपरिमित विविधभुवन भरिताखण्ड ब्रह्माण्डमण्डल पिचण्डिलः, आर्यधुर्यानन्तार्य पवित्र खनित्रपात पात्रीकृत निजचुबुक गतव्रणकिण विभूषण वहनसूचित श्रितजन वत्सलतातिशयः, मड्डुडिण्डिम ढमरु जर्घर काहली पटहावली मृदुमद्दलादि मृदङ्ग दुन्दुभि ढक्किकामुख हृद्य वाद्यक मधुरमङ्गल नादमेदुर नाटारभि भूपाल बिलहरि मायामालव गौल असावेरी सावेरी शुद्धसावेरी देवगान्धारी धन्यासी बेगड हिन्दुस्तानी कापी तोडि नाटकुरुञ्जी श्रीराग सहन अठाण सारङ्गी दर्बारु पन्तुवराली वराली कल्याणी भूरिकल्याणी यमुनाकल्याणी हुशेनी जञ्झोठी कौमारी कन्नड खरहरप्रिया कलहंस नादनामक्रिया मुखारी तोडी पुन्नागवराली काम्भोजी भैरवी यदुकुलकाम्भोजी आनन्दभैरवी शङ्कराभरण मोहन रेगुप्ती सौराष्ट्री नीलाम्बरी गुणक्रिया मेघगर्जनी हंसध्वनि शोकवराली मध्यमावती जेञ्जुरुटी सुरटी द्विजावन्ती मलयाम्बरी कापीपरशु धनासिरी देशिकतोडी आहिरी वसन्तगौली सन्तु केदारगौल कनकाङ्गी रत्नाङ्गी गानमूर्ती वनस्पती वाचस्पती दानवती मानरूपी सेनापती हनुमत्तोडी धेनुका नाटकप्रिया कोकिलप्रिया रूपवती गायकप्रिया वकुलाभरण चक्रवाक सूर्यकान्त हाटकाम्बरी झङ्कारध्वनी नटभैरवी कीरवाणी हरिकाम्भोदी धीरशङ्कराभरण नागानन्दिनी यागप्रियादि विसृमर सरस गानरुचिर सन्तत सन्तन्यमान नित्योत्सव पक्षोत्सव मासोत्सव संवत्सरोत्सवादि विविधोत्सव कृतानन्दः श्रीमदानन्दनिलय विमानवासः, सतत पद्मालया पदपद्मरेणु सञ्चितवक्षस्तल पटवासः, श्रीश्रीनिवासः सुप्रसन्नो विजयतां. श्री‌अलर्मेल्मङ्गा नायिकासमेतः श्रीश्रीनिवास स्वामी सुप्रीतः सुप्रसन्नो वरदो भूत्वा, पवन पाटली पालाश बिल्व पुन्नाग चूत कदली चन्दन चम्पक मञ्जुल मन्दार हिञ्जुलादि तिलक मातुलुङ्ग नारिकेल क्रौञ्चाशोक माधूकामलक हिन्दुक नागकेतक पूर्णकुन्द पूर्णगन्ध रस कन्द वन वञ्जुल खर्जूर साल कोविदार हिन्ताल पनस विकट वैकसवरुण तरुघमरण विचुलङ्काश्वत्थ यक्ष वसुध वर्माध मन्त्रिणी तिन्त्रिणी बोध न्यग्रोध घटवटल जम्बूमतल्ली वीरतचुल्ली वसति वासती जीवनी पोषणी प्रमुख निखिल सन्दोह तमाल माला महित विराजमान चषक मयूर हंस भारद्वाज कोकिल चक्रवाक कपोत गरुड नारायण नानाविध पक्षिजाति समूह ब्रह्म क्षत्रिय वैश्य शूद्र नानाजात्युद्भव देवता निर्माण माणिक्य वज्र वैढूर्य गोमेधिक पुष्यराग पद्मरागेन्द्र नील प्रवालमौक्तिक स्फटिक हेम रत्नखचित धगद्धगायमान रथ गज तुरग पदाति सेना समूह भेरी मद्दल मुरवक झल्लरी शङ्ख काहल नृत्यगीत तालवाद्य कुम्भवाद्य पञ्चमुखवाद्य अहमीमार्गन्नटीवाद्य किटिकुन्तलवाद्य सुरटीचौण्डोवाद्य तिमिलकवितालवाद्य तक्कराग्रवाद्य घण्टाताडन ब्रह्मताल समताल कोट्टरीताल ढक्करीताल एक्काल धारावाद्य पटहकांस्यवाद्य भरतनाट्यालङ्कार किन्नेर किम्पुरुष रुद्रवीणा मुखवीणा वायुवीणा तुम्बुरुवीणा गान्धर्ववीणा नारदवीणा स्वरमण्डल रावणहस्तवीणास्तक्रियालङ्क्रियालङ्कृतानेकविधवाद्य वापीकूपतटाकादि गङ्गायमुना रेवावरुणा
शोणनदीशोभनदी सुवर्णमुखी वेगवती वेत्रवती क्षीरनदी बाहुनदी गरुडनदी कावेरी ताम्रपर्णी प्रमुखाः महापुण्यनद्यः सजलतीर्थैः सहोभयकूलङ्गत सदाप्रवाह ऋग्यजुस्सामाथर्वण वेदशास्त्रेतिहास पुराण सकलविद्याघोष भानुकोटिप्रकाश चन्द्रकोटि समान नित्यकल्याण परम्परोत्तरोत्तराभिवृद्धिर्भूयादिति भवन्तो महान्तोज़्नुगृह्णन्तु, ब्रह्मण्यो राजा धार्मिकोज़्स्तु, देशोयं निरुपद्रवोज़्स्तु, सर्वे साधुजनास्सुखिनो विलसन्तु, समस्तसन्मङ्गलानि सन्तु, उत्तरोत्तराभिवृद्धिरस्तु, सकलकल्याण समृद्धिरस्तु ॥

हरिः ॐ ॥

Monday, 13 November 2017

श्रीदुर्गाध्यानाष्टकम्

श्रीदुर्गाध्यानाष्टकम्
***************
                   (१)
चं चं चं चन्द्रचूडा चरणरणरणा
                           चातुरी चारुनेत्रा
जं जं जं जाल्मजैत्री  जनगणजयदा 
                         ज्वालिनी योगजन्मा ।
डं डं डं डामरोक्ता डमरुडमडमा 
                          डाकिनी दण्डदात्री
रं रं रं रक्तवर्णा रणनिकररता 
                           रातु शं रम्यदुर्गा ।।
                     (२)
या देवी शशिशेखरा भयहरा
                          देवासु्रैर्वन्दिता
स्वर्णाढ्या कमनीयकान्तिलसिता           
                          केयूरसंशोभिता ।
शाटी भाति कटीतटे कनकभा 
                         यस्या गले मौक्तिकं
नित्यं तां परमेश्वरीं भगवतीं 
                          दुर्गां भजे सर्वदाम् ॥
                    (३)
यां नत्वा विबुधा ब्रजन्ति समरं 
                         हन्तुं महाराक्षसान्
सिद्धा इष्टफलाय योगिपुरुषा 
                        योगं सदा सिद्धये ।
भक्ताः प्रेमरसं जनाश्च विभवं 
                          बीरा बलं प्राप्तये
नित्यं तां परमेश्वरीं भगवतीं 
                      दुर्गां भजे सर्वदाम् ॥
                   (४)
यस्याः पादतले नमन्ति सकला 
                         लोका महीमण्डले
लब्धुं दिव्यफलं धनानि कुशलं 
                         सौभाग्यराशिं सदा ।
यत्कीर्त्तिं भुवनत्रये विहरते 
                         यन्नाम शक्तिप्रदं
नित्यं तां परमेश्वरीं भगवतीं 
                         दुर्गां भजे सर्वदाम् ॥
                    (५)
या माता भवतारिणी शशीमुखी
                         विश्वात्मिका भार्गवी
दैत्यध्वंसकरी प्रमाददलिनी 
                          यापि स्वयं पार्वती ।
यस्याः पादयुगे ब्रजन्ति शरणं 
                           लब्धुं कृपां साधवो
नित्यं तां परमेश्वरीं भगवतीं 
                           दुर्गां भजे सर्वदाम् ॥
                     (६)
भक्तानां प्रियदायिनी प्रियमयी 
                           विद्युत्प्रभाशोभिता
हस्तैः शूलगदासिवारिजधरा 
                            भालेपि नेत्रान्विता ।
शीर्षांशे शशिलाञ्छना रविनिभा   
                            लोकार्त्त संमर्द्दिनी
नित्यं तां परमेश्वरीं भगवतीं 
                           दुर्गां भजे सर्वदाम् ॥
                    (७)
मुक्तादामविलम्बिनी कमलिनी
                           सिंहासिनी शूलिनी
शम्भुप्राण-विमोहिनी त्रिनयना 
                            संतापसंहारिणी ।
प्राणत्राणपरायणी हि जननी 
                            संसारसंपालिनी
नित्यं तां परमेश्वरीं भगवतीं 
                           दुर्गां भजे सर्वदाम् ॥
                      (८)
बुद्ध्या शुम्भनिशुम्भदैत्यशमनी
                                या शत्रुवंशार्द्दिनी
शक्त्या या महिषासुरप्रमथिनी 
                          लोकार्त्तिसंघातिनी ।
प्रीत्या वैभवभक्तिशक्तिकुशलं 
                             भक्ताय दत्ते च या
नित्यं तां परमेश्वरीं भगवतीं 
                            दुर्गां भजे सर्वदाम् ॥

वेदानुसार ऋषि कौन हैं ?

वेदानुसार ऋषि कौन हैं ?


प्रत्यर्धिर्यज्ञानामश्वहयो रथानाम्।

ऋषि: स यो मनुर्हितो विप्रस्य यावयत्सख: ॥

                                (ऋ० १० । २६ । ५)

शब्दार्थ :- (ऋषि: स:) ऋषि वह है (य:) जो (यज्ञानां प्रति अर्धि:) यज्ञों का प्रतिपादक है, जो यज्ञ के तुल्य शुद्ध , पवित्र , एवं निष्पाप है , (रथानाम् अश्व:-हय:) जो रथों का = जीवन-रथों का आशु प्रेरक है , शीघ्र संचालक है , शुभ कर्मो का प्राण है , (मनु: हित:) जो मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाला है , (विप्रस्य सख:) जो ज्ञानी , बुद्धिमान और धार्मिक व्यक्तियों का सखा है , (यावयत्) जो सब दुखों को दूर कर देता है ।

भावार्थ :- ऋषि कौन है ? विभिन्न ग्रन्थों में ऋषि शब्द की विभिन्न व्याख्याएँ मिलेंगी।

वेद की जो ऋषि शब्द की परिभाषा है वह अपूर्व , अद्भुत एवं निराली है । ऋषि के लक्षणों का वर्णन करते हुए वेद कहता है –

१.  ऋषि वह है जो यज्ञों = श्रेष्ठ कर्मों का सम्पादन करता है , जो स्वयं यज्ञ के समान पवित्र एवं निर्दोष है और शुभ कार्यों को ही करता है ।

२.  ऋषि वह है जो जीवन रथों को शीघ्र प्रेरणा देता है , जो कुटिल , दुराचारी , व्यभिचारी , व्यक्तियों को भी अपनी सुप्रेरणा से सुपथ पर चलता है ।

३.  ऋषि वह है जो बिना किसी भेदभाव के , बिना पक्षपात के मनुष्यमात्र का हितसाधक हो ।

४. ऋषि वह है जो ज्ञानियों व बुद्धिमान व्यक्तियों का मित्र है ।

५. ऋषि वह है जो मनुष्य-मात्र की परिधि से भी आगे बढ़कर प्राणिमात्र के कष्टों और दुखों को दूर करता है ।